एक ऐसी जगह जहाँ अपनों के मरने पर मनाई जाती है खुशियां, लोग नाचने गाने के साथ निकालते हैं जुलूस

नयी दिल्ली, अपने परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाने पर हर किसी को सदमा पहुंचता है. उसके बाद पूरा परिवार कई महीने तक उसे भुला ही नहीं पाता. यही नहीं परिवार के लोग कई दिन तक सदमे में रहते हैं और खाना-पीना तक छोड़ देते हैं.

किसी की मृत्यु पर दुखी होना इंसान ही नहीं बल्कि जानवरों की भी प्रवृत्ति होती है. लेकिन आज हम आपको दुनिया के एक ऐसे स्थान के बारे में बताने जा रहे हैं जहां किसी की मौत होने पर परिवार के लोगों को ना तो कोई तकलीफ होती है और ना ही सदमा लगता है. यही नहीं ये लोग परिवार के किसी भी सदस्य की मौत पर खुशियां मनाते हैं.

यहां मनाई जाती है मौत पर खुशियां

दरअसल, हम इंडोनेशिया के बाली द्वीप की बात कर रहे हैं. इस द्वीप पर किसी इंसान की मौत किसी पर्व से कम नहीं होती है. यहां जब भी कोई मरता है तो परिवार के अन्य सदस्य नाच-गाना शुरू कर देते हैं. उनका यह उल्लास और पर्व काफी लंबे समय तक चलता है. बाली निवासियों का मानना है कि मृत्यु के पश्चात आत्मा सभी बंधनों से मुक्त हो जाती है इसीलिए पारिवारिक सदस्यों को उत्साहित होकर आत्मा के बंधन मुक्त होने की खुशियां मनानी चाहिए.

त्योहार की तरह अच्छे कपड़े और आभूषण पहनकर निकलती हैं महिलाएं

यही नहीं जब किसी परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु होती है तो उस परिवार के लोग रंग-बिरंगी पोशाकों में शव को अंतिम विदाई देते हैं. युवतियां महंगे और चमकीले आभूषण पहनकर निकलती हैं. बालों में सुंदर फूल लगाकर और बैंड बाजे के साथ सब बाहर निकलते हैं और साथ-साथ चलती हुई मृदंग की ध्वनि पर्व जैसा अहसास करवाती है.

शव के अंतिम संस्कार पर निकलता है जुलूस

इसके अलावा जुलूस की तरह शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जाता है. जुलूस के आगे-आगे रेशमी कपड़ों और फूल-मालाओं से लिपटा एक साठ फीट लंबा स्तंभ चलाया जाता है और इस स्तंभ के अंदर ही शव को रखा जाता है. बता दें कि बाली द्वीप के लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी सशक्त नहीं होती कि वह शव का अंतिम संस्कार कर पाएं इसीलिए अधिकांश लोगों को अपना घर तक बेचना पड़ता है.

लेकिन बाली-निवासी के लिए इससे बढ़कर और क्या बात होगी, जो उसने किसी मृत व्यक्ति की आत्मा के लिए अपना घर-बार बेचकर भी अपने कर्त्तव्य का पालन किया. जब कोई मरता है तो उसके घर के बाहर घी का दिया जलाया जाता है और शव को ठीक दहलीज पर रखकर शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा की जाती है. कभी-कभी तो दफनाने का यह शुभ मुहूर्त कई दिनों तक नहीं आता है.

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