दारुल उलूम देवबंद का अफगानिस्तान के तालिबान से कोई संबंध नहीं : मौलाना अरशद मदनी

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देवबंद: दारूल उलूम देवबंद के सदर मुदरिर्स (शिक्षा प्रमुख) इसी संस्था की मजलिसे-शूरा के सदस्य और जमीयत उलमाए हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने अफगानिस्तान में बदले हालात पर जोर देते हुए कहा कि देवबंद का अफगानिस्तान के तालिबान से कोई संबंध नहीं है।

मदनी ने कहा कि वहां की नई सरकार के नुमाइंदे देश और दुनिया से जो वायदे कर रहे हैं वह जब उन पर खरा उतरेंगे तब ही उन पर भरोसा किया जा सकेगा। अभी उनके बारे में कोई राय कैसे व्यक्त की जा सकती है। अस्सी वर्षीय मौलाना अरशद मदनी जो मौलाना हुसैन अहमद मदनी, जिन्होंने महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी के बेटे हैं।

उन्होंने अफगानिस्तान के मुद्दे पर दारूल उलूम और जमीयत दोनों का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि 1947 के बाद अफगानिस्तान से दारूल उलूम में कोई पढ़ने नहीं आया। वहां के तालिबानियों ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान के मदरसों में शिक्षा ली होगी। मौलाना मदनी ने कहा कि अफगानिस्तान में वहां की नई सरकार को बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों में किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए। नफरत और रंजिश की बुनियाद पर ही किसी मुल्क में अमन और शांति एवं एकता कायम नहीं रह सकती है। इसके उलट कोई मुल्क ज्यादा दिनों तक स्थिर और अखंड नहीं रह सकता। अफगानिस्तान की मुस्लिम औरतों को अधिकार और स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, जैसी हमारे मुल्क भारत में इन औरतों को प्राप्त है। हमें अफगानिस्तान में आगे होने वाले हालात पर नजर रखनी होगी।

उन्होंने कहा कि भारत ने अफगानिस्तान में 400 योजनाओं में करीब तीन बिलियन डालर का निवेश किया है। भारत सहित कई देशों के राजनयिक और नागरिकों ने अफगानिस्तान छोड़ा है। उनकी अपनी जानकारी यह है कि तालिबान ने किसी पर भी भागने का दबाव नहीं बनाया। इस सवाल पर कि बीती रात भी अफगानिस्तान में काबुल के हवाई अड्डे के आसपास तीन बम धमाकों में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है। मौलाना मदनी बोले कि यह तो किसी भी देश में हो सकता है।

मदनी ने कहा कि दारूल उलूम के सदर मुदरिर्स रहे शेखूल हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी (1851&1920) ने देश की आजादी के लिए रेशमी रूमाल तहरीक चलाई थी और अफगानिस्तान में भारत की निर्वासित सरकार स्थापित की थी। जिसके सदर राजा महेंद्र प्रताप सिंह थे। अफगानिस्तान के लोग उन्हीं मौलाना महमूद हसन देवबंदी को अपना इमाम मानते हैं ,जैसे मौलाना महमूद हसन ने भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करने की लड़ाई लड़ी थी। अफगानिस्तान के लोग भी उनसे प्रेरणा लेकर अपने देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करा रहे हैं।

मौलाना मदनी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के पिछले तीन वर्षों से काफी करीब हैं और दोनों के बीच अपने देश को लेकर महत्वपूर्ण बातचीत हुई हैं। उसी संदर्भ में मौलाना मदनी ने कहा कि देश में अमन और भाईचारे को लेकर हम दोनों के विचारों में समानता है। भागवत जी ने उनसे कहा था कि वह अपनी सोच को धीरे-धीरे आगे बढ़ाएंगे। भागवत जी की तरह वह खुद भी यह मानते हैं कि हिंदुस्तानी हिंदू और मुसलमानों के पुरखे एक थे और उनकी रगो में वही खून है। हमारी जीन एक है। मुसलमानों में भी राजपूत, गुर्जर, जाट और ब्राह्मण आदि सभी जातियों के लोग हैं। हमारे बीच किसी तरह के भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं है।

मॉब लिचिंग को लेकर आसाम में दिए गए मोहन भागवत के बयान की सराहना करते मौलाना मदनी कहते हैं कि जो बात वह अफगानिस्तान के संदर्भ में कह रहे हैं ,कि किसी भी सरकार को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यकों में भेदभाव नहीं करना चाहिए और सभी को साथ लेकर देश चलाना चाहिए। उनके यही विचार भारत के संदर्भ में भी प्रासंगिक हैं।

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