बच्चों में संपत्ति का बंटवारा करते समय बहुत सतर्क रहना चाहिए, कभी भी बच्चों को जीते जी संपत्ति नहीं देनी चाहिए

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नई दिल्ली, रेमंड ग्रुप के चेयरमैन रहे विजयपत सिंघानिया ने उद्योगजगत में खूब नाम कमाया लेकिन उम्र के ढलान पर उनकी निजी जिंदगी काफी तकलीफदेह हो गई है।

जिसका दर्द उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘एन इनकम्प्लीट लाइफ’ में बयां किया है। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक उन्हें ये मिला है कि अपने बच्चों में संपत्ति का बंटवारा करते समय बहुत सतर्क रहना चाहिए और कभी भी बच्चों को जीते जी संपत्ति नहीं देनी चाहिए।

अपनी आत्मकथा में उन्होंने अपने बचपन से लेकर रेमंड में रहते हुए गुजरे शानदार वक्त और फिर मुश्किल और तनाव भरे बुढ़ापे के बारे में खुलकर बात की है।

कभी रेमंड जैसे ग्रुप को संभालने वाले विजयपत सिंघानिया को 2015 में बड़ा झटका लगा था जब उन्हें परिवार में हुए संपत्ति विवाद के चलते उन्हें अपने काम से अलग कर दिया गया था। इससे भी बड़ा दुख उनके लिए यह था कि उन्हें अपने पैतृक घर से भी बाहर जाना पड़ा था और तब से सिंघानिया उसे वापस पाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है “इस अनुभव से मुझे सबसे बड़ा सबक मिला है कि अपने जीवनकाल में ही अपनी संपत्ति बच्चों में बांटते समय बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए। आपकी संपत्ति आपके बच्चों को दी जानी चाहिए लेकिन केवल आपकी मौत के बाद। मैं नहीं चाहता कि किसी भी माता-पिता को ऐसा दिन देखना पड़े जैसा मैं रोज जी रहा हूं।”

सिंघानिया ने आत्मकथा में बताया है कि वह एकदम अकेले रह गए हैं। मुझे अपने ही ऑफिस में जाने से रोक दिया गया है जहां मेरे महत्वपूर्ण कागजात और मुझसे जुड़ी चीजें रखी हुई हैं। इसके साथ ही मुझे मुंबई और लंदन स्थित घर में अपनी कार छोड़नी पड़ी है और मुझे अपने सेक्रेटरी से भी बात करने की अनुमति नहीं है।

पैन मैकमिनल इंडिया से प्रकाशित आत्मकथा में उन्होंने बताया है कि ऐसा लगता है जैसे रेमंड के कर्मचारियों पर उनसे बात न करने और ऑफिस में न जाने देने को लेकर ऊपर से आदेश दिया गया है।

मशहूर सिंघानिया परिवार में जन्में विजयपत सिंघानिया से बचपन से ही ये उम्मीद थी कि वे एक दिन परिवार का कारोबार संभालेंगे। उन्होंने एक समय आने पर उन्होंने किया भी लेकिन यह कभी उन्हें उनके सपनों का पीछा करने और उन्हें पाने से नहीं रोक सका।

सिंघानिया को आकाश से प्यार था और जब वह इसे पूरा करने के लिए उतरे तो एविएटर के तौर पर उन्होंने दो विश्व रिकॉर्ड बना दिए। मुंबई के शेरिफ बने और कुछ समय के लिए प्रोफेसर भी रहे।

सिंघानिया कहते हैं कि उन्हें ठीक से नहीं पता कि उड़ना कब से उनका प्यार बना लेकिन जब भी वह कोई एयरक्राफ्ट टेक ऑफ या लैंड करते देखते तो रोमांच से भर जाते थे। जब वह बड़े हो रहे थे तब जहाज उड़ाने की उम्र 21 साल हुआ करती थी। इस उम्र तक पहुंचने के 11 दिन बाद ही 15 अक्टूबर 1959 में उन्होंने अपना पहला फ्लाइंग प्रशिक्षण प्रशिक्षण बॉम्बे प्लाइंग क्लब में हासिल किया। 1960 में उन्होंने कानपुर के हिंद प्रोविंसियल फ्लाइंग क्लब से हासिल किया।

इसके बाद उनके पास विमान उड़ाने का लाइसेंस था लेकिन वह अपना विमान उड़ाना चाहते थे। आखिर में उन्होंने 92000 रुपये में सिंगल इंजन विमान खरीदा।

सिंघानिया की तमाम फ्लाइंग उपलब्धियों में ब्रिटेन से भारत के लिए एक माइक्रोलाइट विमान अकेले उड़ाना भी शामिल है। 1988 में 23 दिनों का गर्म हवा के गुब्बारे पर समुद्र तल से 69,852 फीट ऊपर उड़ने वाले वह पहले व्यक्ति बने और विश्व रिकॉर्ड बनाया।

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