स्वैप (अदला-बदली) किडनी ट्रांसप्लांट करने वाला संजय गांधी पीजीआइ प्रदेश का पहला ऐसा संस्थान बना

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लखनऊ, एक करिश्मा कर दिखाया संजय गांधी पीजीआइ के चिकित्सकों ने। आजमगढ़ निवासी महिला की किडनी खराब थी। पति अपनी किडनी देना चाहते थे, पर चिकित्सकीय जटिलता ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। दूसरी तरफ लखनऊ की एक महिला भी अपने पति को किडनी देकर जान बचाना चाहती थी, पर ऐसी ही कुछ परेशानी ने इन्हें भी रोक लिया। पीजीआइ में भर्ती दोनों मरीजों की जान बचाने के लिए डाक्टरों ने कुछ अलग करने का प्रयास किया। महिला ने महिला को और पुरुष ने पुरुष को किडनी देकर दो घरों में प्राण रक्षा वायु का प्रवाह कर दिया।

संजय गांधी पीजीआइ प्रदेश का पहला संस्थान बन गया, जिसने स्वैप (अदला-बदली) किडनी ट्रांसप्लांट किया। 31 अगस्त को इस सफल ट्रांसप्लांट को अंजाम दिया गया। डोनर और किडनी लेने वाले दोनों जोड़े ठीक हैं। इस तरह के ट्रांसप्लांट में पेयर्ड किडनी एक्सचेंज किया जाता है। नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. नारायण प्रसाद के मुताबिक, स्वैप किडनी ट्रांसप्लांट में एक जोड़ी के डोनर किडनी का दूसरे के साथ आदान-प्रदान किया जाता है।

आजमगढ़ की रहने वाली 53 वर्षीय महिला को अंतिम चरण के गुर्दे की बीमारी थी, जिसका इलाज केवल ट्रांसप्लांट था। 2018 में ओपीडी में प्रो. नारायण प्रसाद से पहली बार उन्होंने सलाह ली। तब से उनकी डायलिसिस शुरू हो गई। 54 वर्षीय पति एक किडनी दान करने के लिए आगे आए। इम्यूनोलॉजिकल मिलान किया गया। क्रॉसमैच परीक्षण पाजिटिव होने के कारण प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त नहीं था। प्रत्यारोपण के बाद इनकी किडनी को पत्नी का शरीर स्वीकार नहीं करता। उसके परिवार में कोई अन्य गुर्दा दाता नहीं था। पति की किडनी इनके लिए उपयुक्त नहीं थी।

लखनऊ के किडनी खराबी से ग्रस्त 47 वर्षीय पुरुष 2019 से डायलिसिस पर थे। उनकी 40 वर्षीय पत्नी स्वेच्छा से किडनी डोनर के रूप में आगे आईं। पत्नी के गुर्दे के खिलाफ प्रतिरक्षा मिलान पर डोनर स्पेसिफिक एंटीबॉडी बहुत अधिक था। क्रॉसमैच पाजिटिव होने के कारण दाता अपने पति को गुर्दा दान करने के लिए उपयुक्त नहीं थी।

प्रो. नारायण प्रसाद ने बताया कि प्रत्यारोपण के वैकल्पिक तरीकों के बारे में सोचा और स्वैप रीनल ट्रांसप्लांट के साथ आगे बढ़ने पर चर्चा की गई। हमने उपरोक्त दोनों दाताओं और लेने वाले के बीच किडनी आदान-प्रदान करने के बाद एक क्रासमैच परीक्षण किया, जिसमें इसे सही पाया गया। दोनों जोडिय़ों को समझाया गया था और वे इसके लिए राजी थे। अन्य पैरामीटर भी ठीक थे ।

ऐसे हुई अदला-बदली : आजमगढ़ की महिला में लखनऊ के महिला की किडनी लगाई गई। लखनऊ के पुरुष में आजमगढ़ के पुरुष की किडनी लगाई गई। , जबकि आजमगढ़ की महिला को उनके पति किडनी दे रहे थे और लखनऊ के पुरुष को उनकी पत्नी किडनी देने आई थीं, लेकिन इनके किडनी आपस में मैच नहीं कर रहे थे।

प्रो. प्रसाद के मुताबिक, संस्थान के ट्रांसप्लांट ऑथराइजेशन कमेटी से स्वैप प्रत्यारोपण के लिए अनुमति प्राप्त की गई थी। ऊतक और मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम, संशोधन और 2014 के नियम के साथ स्वैप दान को कानूनी रूप से अनुमति दी गई थी।

 इस ट्रांसप्लांट में खर्च कम आता है। डिसेन्सीटाइजेशन तकनीकों की कोई आवश्यकता नहीं है। बेहतर ग्राफ्ट (शरीर की किडनी की स्वीकार्यता) और रोगी के जीवित रहने की दर के साथ कम इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं, कम प्रतीक्षा अवधि होती है। इस बेहतर मिलान वाले प्रत्यारोपण की सफलता दर हमेशा डिसेन्सीटाइजेशन के बाद किए गए प्रत्यारोपण से बेहतर होती है।

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