वर्ल्ड हार्ट डे पर विशेष : जानें हार्ट अटैक को लेकर क्या कहते हैं विशेषज्ञ और किसे कितना ख़तरा है ज़्यादा

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नई दिल्ली, देश-दुनिया में जितनी मौत कोरोना की वजह से नहीं हुईं हैं उससे कहीं ज्यादा मौत हर साल दिल की बीमारी से हो जाता है. अगर भारत की बात करें तो 25 से 60 साल का के आयुवर्ग के लोग इस बीमारी से सबसे ज्यादा जान गंवा रहे हैं. WHO के मुताबिक कोरोना की वजह से पिछले साल दुनिया में 18 लाख 13 हजार लोगों की जान गई थी. जबकि साल 2019 में 1 करोड़ 79 लाख लोगों की मौत दिल की बीमारी के कारण हुई।

 

अगर हार्ट अटैक से होने वाली मौत के आंकड़ों को प्रतिशत में देखें तो पूरी दुनिया में हुई मौत का 32 प्रतिशत हिस्सा अकेले हार्ट अटैक का है. आंकड़ों का अगर विश्लेषण करें तो यह भी सामने आता है कि इन 1 करोड़ 79 लाख लोगों में 1 करोड़ 52 लाख वैसे लोग शामिल हैं जिन्हें सीधे दिल का दौरा पड़ा और मौत हो गई।

 

दिल की बीमारी बहुत बार आपको समय नहीं देती कि हॉस्पिटल पहुंच पाए. हम अगर सुनते हैं कि मरीज रात को सोया तो उठा नहीं, पार्क में गया तो वापिस नहीं आया वो एक बहुत कॉमन है. 50 प्रतिशत हार्ट के मरीजों को हॉस्पिटल जाने का मौका तक नहीं मिलता. गैस का दर्द समझते हैं लेकिन ऐसा करने से वो देर कर देते हैं।

 

मेडिकल की दुनिया में हार्ट अटैक को साइलेंट किलर या नंबर वन किलर कहा जाता है और भागदौड़ भरी जिंदगी भारतीयों के लिए भी जानलेवा साबित हो रही है. दुनिया की सबसे बड़ी मेडिकल जर्नल द लेंसेंट के मुताबिक 1990 में देश के भीतर 13 लाख लोगों की मौत दिल की बीमारी से हुई थी. यह मौत कुल मौत का 13 प्रतिशत था।

 

साल 2016 में दिल की बीमारी से देश में 28 लाख मौत दर्ज हुई थी जो कि कुल मौत का 28 प्रतिशत था. इन आंकड़ों का मतलब ये है कि वक्त के साथ दिल की बीमारी देश के भीतर बढ़ी है. ऐसे में अगर आप अभी से सचेत नहीं हुए तो भविष्य में इस बीमारी से संकट और अधिक बढ़ेगा।

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