क्या हो रहा है सहयोगी दलों का बीजेपी से मोहभंग, या कोई और है रणनीति,तीन मजबूत सहयोगियों ने छोड़ा साथ

नई दिल्ली, क्या एकला चलो की भाजपा की रणनीति राजग के आकार को छोटा करती जा रही है? मंगलवार को जदयू के राजग से किनारा करने के बाद सियासी गलियारे में यह सवाल प्रमुखता से उठ रहा है।

गौरतलब है कि बीते लोकसभा चुनाव के बाद महज दो साल के अंतराल में भाजपा ने शिवसेना, अकाली दल और जदयू के रूप में अपने तीन अहम सहयोगी खोए हैं।

लोकसभा चुनाव के बाद उसी साल अंत में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद तब राजग की सबसे बड़ी सहयोगी शिवसेना ने भाजपा ने नाता तोड़ा था। इसके बाद बीते साल कृषि कानूनों के खिलाफ भाजपा की सबसे पुराने सहयोगियों में से एक अकाली दल ने किनारा किया। शिवसेना के नाता तोड़ने के बाद जदयू भाजपा की सबसे बड़ी सहयोगी थी। हालांकि, शिवसेना संसदीय दल में फूट के कारण भाजपा को इसके एक धड़े का साथ मिल सकता है।

मंत्रिमंडल में अब तीन ही सहयोगी
वर्तमान में लोकसभा में छह सांसदों वाली पार्टी लोजपा भाजपा की सबसे बड़ी सहयोगी है। मोदी मंत्रिमंडल में भी तीन ही सहयोगियों लोजपा, अपना दल और आरपीआई को ही प्रतिनिधित्व हासिल है। इसमें से आरपीआई का लोकसभा में प्रतिनिधित्व नहीं है।

अंतर्विरोधों में उलझी : पूर्वी राज्यों ओडिशा और बंगाल में बढ़ी चुनौतियां
जदयू की विदाई के बाद भाजपा के लिए पूर्वी राज्यों बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में चुनौतियां बढ़ गई हैं। पश्चिम बंगाल में पार्टी तृणमूल कांग्रेस के मुकाबले अंतर्विरोधों में उलझी है। ओडिशा में बीते दो दशकों से पार्टी बीजद से पार नहीं पा सकी है। अब बिहार में उसके सामने जदयू, राजद, कांग्रेस और वाम दलों का मजबूत गठबंधन है। इन तीन राज्यों में लोकसभा की 122 सीटें हैं।

बड़े राज्यों में झटका, दक्षिण में आधार बनाने का संघर्ष
वर्तमान में बड़े राज्यों की बात करें तो भाजपा के पास हाल ही में महाराष्ट्र की सत्ता आई है। इसके अलावा पार्टी मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक की सत्ता पर ही काबिज है। केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश में पार्टी आधार बनाने के लिए ही संघर्ष कर रही है। बिहार के घटनाक्रम का हिंदीपट्टी पर असर पड़ा, तो भविष्य में भाजपा की मुश्किलें और बढ़ेंगी।

क्षेत्रीय दलों को खत्म करने का लग रहा आरोप
भाजपा पर क्षेत्रीय दलों को खत्म करने और एकला चलो की रणनीति के कारण सहयोगियों को खोने का आरोप लग रहा है। इस्तीफा देने के बाद नीतीश ने इसी आशय का आरोप लगाया। अकाली दल के नरेश गुजराल ने भी भाजपा पर क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व खत्म करने की साजिश का आरोप लगाया।

संबंध खत्म मगर अवसर नहीं
जहां तक बिहार के घटनाक्रम का सवाल है, तो जदयू के दांव से भले ही भाजपा को झटका लगा है, मगर राज्य में उसके लिए अवसर खत्म नहीं हुए हैं। साल 2005 से राज्य में पार्टी की ताकत राजद और जदयू के मुकाबले लगातार बढ़ी है। नई सरकार अगर बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाई। भविष्य में अंतर्विरोध का शिकार हुई, तो यह भाजपा को नया अवसर उपलब्ध करा सकता है।

पहले भी कई दलों ने किया किनारा
मोदी सरकार के बीते और वर्तमान कार्यकाल के दौरान भी कई दलों ने राजग से नाता तोड़ा। पहले तेदेपा व उसके बाद पीडीपी ने भाजपा से नाता तोड़ा। सुदेश महतो के नेतृत्व वाले ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन, ओपी राजभर के नेतृत्व वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, हनुमान बेनीवाल के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी, बोडो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ), गोरखा जनमुक्ति मोर्चा, जैसे कई अन्य उप-क्षेत्रीय खिलाड़ी थे। गोवा फॉरवर्ड पार्टी, एमडीएमके और डीएमडीके भी सत्तारूढ़ गठबंधन से बाहर हो गए।

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